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Gaaj Mata Ka Vrat Katha & Puja Vidhi: गाज बीज माता का व्रत कैसे करें? क्या है पूजा विधि?

Gaaj Mata Ka Vrat Katha & Puja Vidhi

गाज बीज माता का व्रत।

Gaaj Mata Ka Vrat Katha & Puja Vidhi: गाज का व्रत (Gaaj Mata Ka Vrat) भाद्रपद माह में किया जाता है। हालांकि इसकी कोई तय तिथि नहीं हैं, लेकिन अधिकतर लोग भाद्रपद की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि या फिर अनंत चतुर्दशी के दिन इस व्रत को रखते हैं। आइए, गाज मात के व्रत के बारे में विस्तार से जानते हैं। साथ ही जानेंगे कि इसका व्रत कैसे रखा जाता है। उस दिन कौन सी कथा सुनी जाती है?

गाज बीज का व्रत कैसे करते हैं? (Gaaj Mata Ka Vrat Katha & Puja Vidhi)

भाद्र शुक्ल द्वितीया को अधिकांश गृहस्थों के घर बापू की पूजा होती है। यह बापू की पूजा वास्तव में कुल देवता की पूजा है। इस पूजा में कच्ची रसोई बनाकर बापू देव को भोग लगाया जाता है। फिर सब उसी प्रसाद को पाते हैं। यह प्रसाद प्रायः उन्हीं लोगों को दिया जाता है, जो एक कुल-गोत्र के होते हैं।

गाज बीज का क्या अर्थ होता है? (Gaaj beej kya hota hai)

दोपहर को बापू की पूजा के बाद (खासकर कायस्थ लोगों में) लड़के की मां दीवार में गाजबीज की रचना करती है। एक मढ़ी बनाकर उसमें एक बालक बिठाया जाता है और एक दूसरा बालक वृक्ष के नीचे खड़ा दिखलाया जाता है। मढ़ी के ऊपर गाज का गिरना और वृक्ष का गाज से बचना भी दिखाया जाता है। उसको गाजबीज की पूजा कहते हैं ।

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गाज के व्रत का उद्यापन करने की विधि (Gaaj Ke Vrat Ka Udyapan Karne Ki Vidhi)

जब किसी महिला को पुत्र की प्राप्ति हो या पुत्र का विवाह हो, तो उसे उस वर्ष ये भाद्रपद माह में गाज के व्रत का उद्दापन करना चाहिए। उद्दापन के लिए चुनरी पर सात जगह चार-चार पूड़ी, हलवा और दक्षिणा रखें। इसके बाद एक जल के कलश पर स्वास्तिक बनाएं। विधि के अनुसार गाज की पूजा करें और गेहूं के 7 दाने हाथ में लेकर गाज की कथा सुनें।

गाज माता का व्रत।

इसके बाद कलथ के जल से भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए। सभी पूड़ियां, हलवा और दक्षिणा को चुनरी के साथ सास या किसी ब्राह्मणी को देकर चरण स्पर्श करें। इसके बाद सभी ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा दें। इसके बाद ही आप खुद भोजन कर सकती हैं।

गाज माता का व्रत कब है 2023? (Gaaj Ka Vrat Aur Puajn Kab kare?)

इस साल गाज का व्रत 17 सितंबर 2023 को रख सकते हैं। हालांकि इसे भाद्रपद माह के किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है।

गाज के व्रत की कथा (Gaaj Ke Vrat Ki Katha)

एक समय बरसात के दिनों में भाद्र शुक्ल द्वितीया को एक राजा का लड़का शिकार खेलने जंगल में गया। उसी जंगल में एक गरीब ग्वालिन का लड़का गायें चराता था। दैवात् बड़े जोर से पानी बरसने लगा। तब राजा का लड़का हाथी से उतरकर, जंगल की एक मढ़ी में चला गया। उसी समय मढ़ी पर गाज गिरी जिससे मढ़ी तो फट गई, पर राजा का लड़का बिल्कुल लापता हो गया।

जो गरीब लड़का गायें चराता था, उसकी माता नित्य एक रोटी गाय या बछिया को खिलाती थी या किसी भूखी कुमारी कन्या को दिया करती थी। वह लड़का जिस पेड़ के नीचे खड़ा था, उस पर गाज अवश्य गिरती, परन्तु माता की दी हुई रोटी उस पर इस तरह छा जाती थी कि गाज वृक्ष तक पहुंच ही नहीं सकती थी। कुछ देर में वर्षा बन्द हुई और लड़का आनन्द से अपने घर चला गया।

गाज माता का व्रत।

राजा के सिपाही कुंवर को खोजते हुए उसी जंगल में आए, जहां यह घटना हुई थी। वहां जिन लोगों ने यह सब हाल आंखों देखा, उन्होंने कह सुनाया कि गरीब का लड़का तो बच गया, परन्तु राजा का लड़का मारा गया है। यह समाचार पाकर राजा के मन में बड़ा दुःख हुआ कि मैं इतना पुण्य धर्म करता हूं, फिर भी मेरा लड़का मर गया और जो गरीब स्त्री, एक रोटी रोजाना देती है, उसका लड़का केवल रोटी की बदौलत बच गया। इस चिन्ता में राजा मलिन-मन हो रहा था तब राजा के गुरु ने आकर समझाया कि आप जो पुण्य-धर्म करते हैं, वह अभिमानपूर्वक करते हैं। इसीलिए वह क्षय होता है। परन्तु गरीब स्त्री जो कुछ करती है, श्रद्धापूर्वक करती है।

राजा ने गुरु के चरणों में दण्डवत् करके सन्तोष किया और आगे के लिए अमूल्य शिक्षा लाभ की। उसने उसी समय आज्ञा दी कि अब से आज के दिन व्रत रहकर गाजबीज की पूजा की जाया करे। राजा-रानी ने खुद व्रत किया और पूजन किया। तभी से यह गाजबीज की पूजा चली है।

गाज माता कौन है? (Gaaj Mata Kaun Hain)

एक नगर के राजा-रानी की कोई संतान नहीं थी, जिससे वह हमेशा दुखी रहते थे। महारानी गाज माता की भक्त थीं। एक दिन उन्होंने गाज माता को याद करते हुए कहा कि अगर कोई शिशु मेरे गर्भ में रहता है, तो वह माता के लिए हलवा और पूरी की कढ़ाई करेंगी। गाज माता ने उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया।

जब रानी को पुत्र हुआ, तो वो कढ़ाई करना भूल गई। इससे गाज माता नाराज हो घई। एक दिन जब वो बच्चा पालने में सोया हुआ था, तो एक भयंकर गरजती हुई बादली आई और बच्चे को उठाकर चली गई।

बादली ने उस बच्चे को जंगल में छोड़ दिया। एक भील और भीलनी उस वक्त जंगल से गुजर रहे थे, तो उन्होंने पालने में बच्चे को सोता पाया। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसलिए वह रानी के बेटे को अपने साथ लेकर चले गए।

नगर में एक धोबी रहता था, जब वह राजा के महल कपड़े लेने गया, तो देखा कि शोर हो रहा है। पता चला कि गाज माता, महारानी के बेटे को उठाकर ले गई। धोबी ने बताया कि उसने आज ही एक बच्चे को पालने में सोता हुआ देखा है।

राजा ने तुरंत भील को अपने महल बुलवाया और पूछा कि उसके बाद बच्चा कहां से आया। इस पर भील ने बताया कि वह गाज माता की व्रत करता था, जिसका फल मिला है। इस पर राजा-रानी को याद आ गया कि उन्होंने गाज माता को कढ़ाने करने का वचन किया था।

गाज माता।

राजा ने बताया कि बच्चा उसका है। साथ ही कहा कि बच्चा उसे लौटा दिया जाए। वह दुगनी कढ़ाई करेगा। उसे गाज माता का धूमधाम से उजमन किया, जिससे माता प्रसन्न हो गई। भील को भी पुत्र की प्राप्ति हो गई।

तभी से राजा ने शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जब किसी का बेटा हो, या उसकी शादी हो तो गाज माता का उजमन करे। सभी ने इस पर हामी भरी और तभी से ये गाज का व्रत किया जाता है।

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