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Rishi Panchami Vrat: कैसे रखें ऋषि पंचमी का व्रत? क्या है कथा, आरती और मंत्र?

Rishi Panchami Vrat

ऋषि पंचमी।

Rishi Panchami Vrat: ऋषि पंचमी (Rishi Panchami 2023) के त्योहार को हिंदू पंचांग के भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाया जाता है। यानी गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन। इस व्रत को पाप से मुक्ति के लिए किया जाता है। इसके पूजन से आरोग्यता, समृद्धि, धन-धान्य, वैभव, यश, विजय की प्राप्ति होती है।

ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi)

भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) कहते हैं। यह व्रत प्रायः स्त्रियों का है। किसी-किसी दशा में पुरुष भी अपनी स्त्री के लिए इस व्रत को कर सकता है। व्रत करने वाली स्त्री को चाहिए कि वह भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मध्याह्न के समय स्वच्छ नदी या तालाब पर जाकर प्रथम 108 अथवा 8 अपामार्ग की दातुन करे और फिर मृत्तिका – स्नान (मिट्टी के लेप का स्नान) के पश्चात् पंचगव्य पान करे।

ऋषि पंचमी व्रत।

पुरुष हो तो हवन करके पंचगव्य पान करे। स्त्री हो तो केशव आदि विष्णु के नामों को जपकर पंचगव्य ले। तत्पश्चात स्नान करके प्रथम अपना नित्य कर्म करें। इस विधि से पूजा ‘स्नान करके, घर पर उपवास करनेवाली स्वयं अपने हाथ से पूजा के स्थान को गोबर से चौकोर लीपे। फिर उसी पर अनेक रंगों से सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर मिट्टी अथवा तांबे का घड़ा उस पर रखे। और उसको गले तक कपड़े से ढक दे।

घट के ऊपर तांबे अथवा बांस के पात्र में जौ भरकर और उसमें पंच रत्न, फूल, गन्ध और अक्षत रखकर वस्त्र से ढक दें। उसी स्थान पर अष्टदल कमल लिखकर सप्त ऋषियों की पूजा करे। आवाहन से लेकर ताम्बूल पर्यन्त षोड्शोपचार से पूजन करने के अनन्तर पूजा का पक्वान्न ब्राह्मण को दान करे और आप ऋषि- अन्न का भोजन करे।

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ऋषि पंचमी कब है 2023 (Rishi Panchami 2023 Date)

साल 2023 में ऋषि पंचमी को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी 20 सितंबर 2023 को मनाया जाएगा। इस दिन बुधवार है। पंचमी तिथि 19 सितंबर 2023 को दोपहर 1 बजकर 43 मिनट पर शुरू होगी। 20 सितंबर 2023 को 2 बजकर 16 मिनट पर इसका समापन होगा।

ऋषि पंचमी व्रत कथा कुछ इस प्रकार है (Rishi Panchami Vrat Katha)

ऋषि पंचमी की पहली कथा (Rishi Panchami Ki Katha)

विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण के घर में दो सन्तानें थीं-एक कन्या और एक पुत्र। पुत्र परम्परागत संस्कारों के कारण कम उम्र में सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों का ज्ञाता हो गया था। यद्यपि उसकी बहन भी बहुत सुशीला थी और अच्छे कुल में ब्याही थी, तथापि किसी पूर्व पाप के कारण वह विधवा हो गई थी। उसी दुःख से सन्तप्त वह ब्राह्मण अपनी स्त्री और कन्या सहित गंगा के किनारे वास करने लगा और वहां धर्म-चर्चा करते हुए काल बिताने लगा।

कन्या अपने पिता की सेवा-सुश्रूषा करती थी और पिता अनेक ब्रह्मचारियों को वेद पढ़ाता था। एक दिन सोती हुई कन्या के शरीर में अकस्मात कीड़े पड़ गये। कन्या ने अपनी दशा देखकर माता से कहा। माता ने कन्या के इस दुःख ‘दुःखी होकर बहुत पश्चात्ताप किया और उसने पति को सब वृत्तान्त सुनाकर इसका कारण पूछा।

ऋषि पंचमी की कथा।

उत्तंक ने समाधिस्थ होकर इस घटना के कारण पर विचार किया। और स्त्री को उत्तर दिया कि पूर्व जन्म में यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला अवस्था में अपने बर्तनों का स्पर्श किया था। इसी पाप के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। धर्मशास्त्र में लिखा है कि रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डालिनी के समान, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान और तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र रहती है। चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है।

इसके अतिरिक्त कन्या ने इसी जन्म में एक और भी अपराध किया है। वह यह कि इसने स्त्रियों को ऋषि पंचमी का व्रत करते देखकर उनकी अवहेलना की है। अतः इसके शरीर में कीड़े पड़ने का एक यह भी कारण है। उक्त व्रत की विधि को देखने के कारण ही इसने ब्राह्मण कुल में जन्म पाया है, अन्यथा यह चाण्डाल के घर में जन्म लेती। ऋषि पंचमी का व्रत सब व्रतों में प्रधान है, क्योंकि इसी के प्रभाव से स्त्री सौभाग्य-सम्पन्न रहती है और रजस्वला होने की अवस्था में अज्ञानपूर्वक होने वाले स्पर्शादि से मुक्त हो जाती है।

सतयुग कथा (Rishi Panchami Katha In Hindi)

सत्ययुग में विदर्भ देश में प्रसेनजित नामक एक राजर्षि राज करता था, उसके राज्य में वेद वेदांग का ज्ञाता सुमित्र नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह खेती करके अपना निर्वाह करता था। जयश्री नाम की उसकी स्त्री भी खेती के काम में उसकी सहायक रहती थी। किसी समय वह स्त्री भी रजोवती होकर अज्ञात अवस्था में गृहकार्य करती रही और ब्राह्मण का भी स्पर्श करती रही। समय पाकर दैवयोग से उन दोनों का एक साथ ही प्राणान्त हुआ।

दूसरे जन्म में स्त्री ने कुकुर योनि में जन्म पाया और ब्राह्मण ने बैल का। ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था। वह भी अपने पिता की तरह वेद-वेदांग का ज्ञाता तथा ब्राह्मण और अतिथि का पूजक था। उसके माता-पिता, कुकुर और बैल योनि में उसी के घर में रहते थे। एक समय सुमति ने अपने माता-पिता का श्राद्ध किया। सुमति की स्त्री ने ब्राह्मणों के भोजन के लिए जो खीर बनाई थी, उसमें अकस्मात एक सर्प विष उगल गया।

इस घटना को कुतिया ने देखा था। अतः उसने यह विचार कर कि इस खीर के खानेवाले ब्राह्मण मर जायंगे, खीर को छू लिया। इससे क्रुद्ध होकर सुमति की स्त्री ने कुतिया को जलती हुई लकड़ी से मारा और उसने सब बर्तन खुद दोबारा मांजकर फिर से खीर बनाई। जब सब ब्राह्मण भोजन कर चुके, तब उनका जो जूठन बचा, उसे सुमति की स्त्री ने पृथ्वी में गाड़ दिया। इस कारण कुत्ती उस दिन भूखी ही रही।

ऋषि पंचमी की कथा।

बैल को सुमति ने हल में जोता था और उसका मुंह भी बांध दिया था, जिससे वह भी तृण नहीं चर सका। इन दोनों के भूखे रहने के कारण सुमति का श्राद्ध करना व्यर्थ ही हुआ। सुमति पशु-पक्षियों की भाषा समझता था। अस्तु, वह अपने माता-पिता की स्थिति को जानकर ऋषि-मुनियों के आश्रम में गया और उसने उनसे माता-पिता के पशु-योनि में जन्म पाने का कारण पूछा। ऋषियों ने उन दोनों के पूर्व जन्म के पापों का हाल कह सुनाया और यह भी समझाया कि यदि तुम स्त्री-पुरुष दोनों ऋषि पंचमी का व्रत करके विधिपूर्वक उद्यापन करोगे और उस दिन बैल की कमाई की कोई वस्तु ना खाओगे तो अवश्य ही तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति होगी।

ऋषि-पंचमी के व्रत में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और सपत्नीक वशिष्ठ इन सात ऋषियों की पूजा करने का विधान है। सुमति ने माता-पिता की मुक्ति के लिए ऋषि पंचमी का व्रत किया। अतः ऋषि-पंचमी के व्रत के कारण सुमति के माता-पिता मुक्ति को प्राप्त हो गए।

ऋषि पंचमी की आरती (Rishi Panchami Aarti)

जय-जय ऋषि राजा
प्रभु जय-जय ऋषि राजा
देव समाजहृत मुनि
देव समाजहृत मुनि
कृत सुरगया काजा
जय-जय ऋषि राजा।।

जय-जय दध्यगाथ वर्ण
भारद्वाज गौतम
स्वामि भारद्वाज गौतम
जय श्रृंगी, पराशर
जय श्रृंगी, पराशर
अगस्त्य मुनि सत्तम
जय जय ऋषि राजा।।

वशिष्ठ, विश्वामित्र, गिर, अत्री जय-जय
स्वामि गिर, अत्री जय-जय
कश्यप, भृगु, प्रभृति, जय
कश्यप, भृगु, प्रभृति, जय
जय कृप तप संचय
जय-जय ऋषि राजा।।

वेद मन्त्र दृष्टावन
सबका भला किया
स्वामि सबका भला किया
सब जनता को तुमने
सब जनता को तुमने
वैदिक ज्ञान दिया
जय-जय ऋषि राजा।।

सब ब्राह्मण जनता के
मूल पुरुष स्वामी
स्वामि मूल पुरुष स्वामी
ऋषि संतति
हमको ज्ञानी हों सत्पथगामी
जय-जय ऋषि राजा।।

हम में प्रभु आस्तिकता
आप शीघ्र भर दो
स्वामि आप शीघ्र भर दो
शिक्षित सारे नर हों
शिक्षित सारे नर हों
यह हमको वर दो
जय-जय ऋषि राजा।।

धरणीधर कृत ऋषि जन की
आरती जो गावे
स्वामि आरती जो गावे
वह नर मुनिजन कृपया
वह नर मुनिजन कृपया
सुख संपत्ति पावे
जय-जय ऋषि राजा।।

जय जय ऋषि राजा
प्रभु जय जय ऋषि राजा
देव समाजहृत मुनि
देव समाजहृत मुनि
कृत सुरगया काजा
जय-जय ऋषि राजा।।

ऋषि पंचमी व्रत।

ऋषि पंचमी का मंत्र (Rishi Panchami Mantra)

कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्नणन्त्वर्घ्यं नमो नमः॥

FAQ

Q : ऋषि पंचमी क्यों मनाई जाती हैं?
Ans : अगर कोई महिला जाने-अनजाने में पाप कर लेती है, तो उससे मुक्ति के लिए ऋषि पंचमी का पूजन किया जाता है।

Q : ऋषि पंचमी के पीछे क्या कहानी है?
Ans : ऋषि पंचमी के पीछे की कहानी को भविष्य पुराम में बताया गया है। इसकी दो कहानियां इस आर्टिकल में दी गई हैं।

Q : ऋषि पंचमी में किसकी पूजा की जाती है?
Ans : ऋषि पंचमी में सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। इनमें ऋषिमुनि वशिष्ठ, ऋषि कश्यप, ऋषि विश्वामित्र, ऋषि अत्रि, ऋषि जमदग्नि, ऋषि गौतम और ऋषि भारद्वाज हैं।

Q : ऋषि पंचमी के दिन क्या क्या खाया जाता है?
Ans : ऋषि पंचमी के दिन चावल, मेवे, साबूदाना खीर, फल, दूध से बनी चीजें खाई जा सकती हैं।

Q : क्या हम ऋषि पंचमी में चीनी खा सकते हैं?
Ans : ऋषि पंचमी का व्रत सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलता है। इस दौरान भोजन या पानी का सेवन नहीं किया जाता। नमक, चीनी और मसालों से दूर रहना चाहिए।

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