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Tenaliram Ki Kahaniyan: तेनालीराम और ‘महाराज का सम्मान’

Tenaliram Ki Kahaniyan

तेनालीराम और 'महाराज का सम्मान'

Tenaliram Ki Kahaniyan: महाराज हमेशा तेनाली रमन को उनकी बुद्धिमत्ता तथा हर समस्या को सुलझाने की योग्यता के लिए पुरस्कार दिया करते। एक दिन, महाराज किसी बात पर इतना प्रसन्न हुए कि उन्होंने तेनाली को एक थाल भर कर सोने के सिक्के उपहार में दे दिए। यह देख कर सभी दरबारी दंग रह गए। अब तेनाली को यह चिंता होने लगी कि वे उन सिक्कों को घर कैसे ले कर जाएं। वहां उनके पास इतने सारे सिक्कों को रखने के लिए कोई पोटली या थैली नहीं थी। थाल में रखे सिक्कों को घर ले जाना संभव नहीं था।

जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने कुछ सिक्कों को अपनी जेबों में ठूंस लिया। फिर कुछ सिक्के, कमर पर धोती में लपेट लिए। इसके बाद, कुछ सिक्कों को अपनी पगड़ी में रखा। फिर वे महाराज के पास प्रणाम करने तथा धन्यवाद बोलने गए। ज्यों ही वे झुके तो उनके सारे सिक्के झनझन करते हुए, दरबार के फर्श पर बिखर गए। तेनाली रमन परेशान हो गए और फिर स्वयं झुक-झुक कर एक-एक सिक्का दरबार में से उठाने लगे।

तेनालीराम और ‘महाराज का सम्मान’

Tenaliram Ki Kahaniyan

उन्होंने अपनी पगड़ी वहीं जमीन पर फैला दी और सारे सिक्के उस पर जमा करने लगे। दरबारी यह दृश्य देख कर हँसने लगे और कानाफूसी शुरू हो गई। वे सब मिल कर तेनाली का मजाक उड़ा रहे थे, “जरा देखो तो तेनाली कैसे फर्श पर रेंग-रेंग कर, अपने सिक्के बटोर रहे हैं। इनके पास जो हैं. उससे कभी संतुष्ट नहीं होते। तो एक भी सिक्का भूल से यहां वहां रहने नहीं देंगे। चाहे इन्हें घंटों क्यों न लग जाएं।” वे आपस में बातें करने लगे।

तेनाली रमन सब कुछ सुन कर भी अनजान बने रहे और दरबारियों की कुर्सियों, पर्दों व झालरों के बीच घुस कर अपने सिक्के एकत्र करते रहे। धीरे-धीरे दरबारियों का शोर बढ़ा और वे जोर-जोर से हंसने लगे। अब महाराज का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने भी तेनाली रमन को दरबार के कोने-कोने में लुढ़के हुए सिक्के उठाते हुए देखा। महाराज जानते थे कि तेनाली जो भी कहते या करते हैं, उनके पास हमेशा उसके लिए कोई न कोई उचित तर्क होता है।

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अगर वे दरबार में से सिक्के बटोर रहे थे तो इसे उनका लालच नहीं माना जा सकता। उन्हें लगा कि तेनाली का मजाक उड़ाने वाले दरबारियों को पता लगना ही चाहिए कि तेनाली सारे सिक्के क्यों उठाना चाह रहे हैं। उन्होंने तेनाली से पूछा, “तेनाली! तुम मूर्खों की तरह कुर्सियों, पद व झालरों के बीच घुस कर सोने के सिक्के क्यों बटोर रहे हो? जानते हो कि ऐसा करते हुए तुम कितने मूर्ख और लोभी नजर आ रहे हो!” महाराज ने गंभीर सुर में कहा।

तेनालीराम और ‘महाराज का सम्मान’

तुम इन्हें छोड़ क्यों नहीं देते। बस बहुत हो गया। जो सिक्के गिरे हैं। उन्हें वहीं रहने दो। बाद में हमारे सहायक उन्हें उठा लेंगे। क्या इतने सिक्के पाने के बाद भी तुम्हारा मन नहीं भरा ? तुम कितने लोभी हो।” महाराज बोले। तेनाली ने वे सिक्के संभालने के बाद कहा, “महाराज! मैं न तो मूर्ख और न ही धन का लोभी। आपकी दयालुता के कारण मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है।

पर ये सोने के सिक्के हैं और हर सिक्के पर आपका चेहरा अंकित है। यदि मैं इन्हें यहीं गिरा रहने दूंगा तो किसी न किसी का पैर इन पर पड़ेगा। आपका वफादार होने के नाते मैं आपका यह अपमान कभी सहन नहीं कर सकता। ” महाराज मुस्कुराए और अपने दरबारियों को कनखियों से देखा। अब वे सभी मूर्ख दिखाई दे रहे थे। उनमें से कुछ उठ कर बाकी बचे सिक्के खोज कर देने में तेनाली की मदद करने लगे। महाराज दरबारियों के उतरे हुए चेहरे देख मन ही मन हंस रहे थे।

क्या सीख मिली (Moral of The story)

किस्मत आपका इरादा नही बदल सकती लेकिन आपका इरादा आपकी किस्मत बदल सकता है।

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